शिल्पविद्या

भारतीय प्रौद्योगिकी शास्त्र ‘शिल्प’: एक परिचय

भारतीय शास्त्रीय ज्ञान सम्पदा का मूलाधार ‘वेद’ है, जो चार संहिता तथा अनेक शाखाओं के रूप में आज भी प्रवाहित हो रहा है। आर्ष परम्परा के अनुसार वेद समस्त सत्यविद्याओं का मूल स्रोत है। इसमें परा (आध्यात्मिक) एवं अपरा (भौतिक) विद्याएँ मूलभूत सिद्धान्त (बीज) के रूप में विद्यमान हैं।

मानव कल्याण हेतु ऋषियों ने इन बीजरूपी विद्याओं को जन कल्याण प्रयोजन से चार उपवेदों (१. आयुर्वेद, २. अर्थशास्त्र व धनुर्वेद, ३. गान्धर्ववेद एवं ४. शिल्पवेद) के द्वारा विस्तारित किया है। इस प्रकार प्रौद्योगिकी- टेक्नोलॉजी विषय को ‘शिल्पवेद’ के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।

‘शिल्प’ शब्द ‘शील समाधौ’ धातु से बना है जिसका अर्थ है, ‘मनुष्य के भौतिक आवश्यकता की पूर्ति का विषय’। शिल्प विश्वकोष ‘भृगुशिल्पसंहिता’ में शिल्प को तीन खण्डों में विभाजित किया गया हैं—

नानाविधानां वस्तुनां यन्त्रणां कल्पसम्पदाम् ।

धातुनां साधनानां च वास्तुनां शिल्पसञ्ज्ञितम् ॥

भृगुशिल्पसंहिता । अध्याय १ ॥

नाना प्रकार के विधान, वस्तु तथा यन्त्रों की सहायता से जिस (१) धातु, (२) साधन एवं (३) वास्तु के कार्य को सम्पादित किया जाता है, उसे ‘शिल्प’ कहते हैं।

इन तीन खण्डों को आगे विस्तारित कर १० शिल्पशास्त्र, ३२ शिल्पविद्या एवं ६४ शिल्पकला के रूप में ऋषि-आचार्यों ने प्रस्तुत किया हैं। यह ‘शिल्प विस्तारपट’ निम्न में प्रस्तुत किया गया है।

शिल्प का व्यावहारिक स्वरूप

शिल्पवेद के अन्तर्गत ६४ प्रकार के शिल्पाकलाओं का अभ्यास गाँव में होता था। इसका केन्द्र होता था ‘कुटुम्ब’ एवं इसका अभ्यास ‘कौटुम्बिक उद्योग’ के रूप में किया जाता था। एक-एक प्रकार के शिल्पकला के अभ्यासु अनेक कुटुम्ब मिलकर ‘ज्ञाति’ रूप धारण करते थे। भिन्न-भिन्न शिल्पकलाओं के कई ज्ञातियों को एक स्थान में स्थापित कर ‘ग्रामकूल’ की रचना की जाती थी।

गाँव में उपलब्ध स्थानिक नैसर्गिक संसाधनों (वनस्पति, प्राणी, खनिज तथा मानव सम्बल) का उपयोग कर कौटुम्बिक उद्योगों में जीने के लिए आवश्यक समस्त भौतिक वस्तुओं का उत्पादन-प्रसंस्करण होता था। इसी प्रकार से ‘ग्रामकुल’ राष्ट्र की सबसे लघुतम स्वतन्त्र आर्थिक ईकाई होती थी।

गाँव की आवश्यकता को पूर्ण करने के उपरान्त अत्यधिक वस्तुओं को नगर होते हुए नदी-समुद्र मार्ग से देश-विदेशों में वाणिज्य हेतु भेजा जाता था। इस प्रकार गाँव वा उसके समूह को शिल्पवेद की सहायता से एक वैश्विक ग्राम (global village) के रूप में विकसित कर स्वयं-सम्पूर्ण (self-sufficient) बनाया जाता था।

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