Krishnaji Vinayak Vaze शिल्पविद्या

शिल्पवेद पुनरुद्धारक शिल्पकलानिधि श्री॰ कृष्णाजी विनायक वझे

भारतवर्ष अपनी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। अतीत में यह न केवल अधात्म में अग्रणी अपितु भौतिक उन्नति के पराकाष्ठा पर भी विराजमान थी। इस संवृद्धि के आधार थे प्राचीन भारतीय टेक्नोलॉजी जो ‘शिल्प’ के नाम से प्रसिद्ध है। परन्तु काल के प्रवाह में यह नष्ट होती चली। लगभग ३००० वर्षों के बाद अर्वाचीन समय में शिल्प की शास्त्रीय परम्परा का पुनरुद्धार कार्य श्री॰ कृष्णाजी विनायक वझे ने किया है।

Shri Krishnaji Vinayak Vaze

महाराष्ट्र कोंकण प्रान्त के रत्नागिरि जिला में दि॰ १६ दिसम्बर १८६९ को जन्मे कृष्णाजी ने बाल्यावस्था से ही संस्कृत भाषा एवं शास्त्रों का अध्ययन किया। प्राथमिक शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा के लिए पुणे स्थित ‘कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग’ की सिविल इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया और सन् १८९१ ई॰ में पढ़ाई पूरा कर पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट, मुम्बई में इंजिनियर के रूप में आजीविका का आरम्भ किया।

कृष्णाजी को इंजीनियरिंग शिक्षा ‘अभारतीय’ प्रतीत हुआ क्योंकि जिस भारतीय वास्तु की प्रशंसा समग्र विश्व करता है, उसका सामान्य परिचय भी उन्हें पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ाया  गया। अतः उन्होंने इस विषय को प्रस्तुत करने का दृढ़ संकल्प लेकर अफगानिस्थान से कन्याकुमारी पर्यन्त अखण्ड भारतवर्ष का प्रवास कर ४०० प्राचीन शिल्पशास्त्रों का अन्वेषण-संग्रह-संकलन किया। इसमें वर्णित युद्धविद्या का अभ्यास कर देश स्वाधीन करने हेतु प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लेने की योजना बनाई, परन्तु बाल गङ्गाधर तिलकजी के प्रेरणा से शिल्पशास्त्रों का पुनरुद्धार कार्य को जीवन का लक्ष्य निश्चित कर आगे बढ़े।

शिल्प परम्परा पुनर्निर्माण के क्रम में कृष्णाजी ने साहित्यों का निर्माण तीन विभागों में किया है। पहला विभाग में भारतीय संस्कृति के मूलाधार ‘धर्मशिक्षा’ पर १० ग्रन्थों का लेखन व प्रकाशन, दूसरा विभाग में शिल्प की विश्वकोष ‘भृगुशिल्पसंहिता’ अन्तर्गत १० शिल्पशास्त्र-३२ शिल्पविद्या व ६४ शिल्पकलानुसार ११ शिल्पशास्त्रों का सृजन तथा अन्तिम विभाग में शिल्प आधारित अर्थ एवं राज्य व्यवस्था पर ६ पुस्तकों का रचना किया है। सहस्र व्याख्यान एवं लेखमाला देश के विभिन्न स्थान व पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे व शिल्प पाठ्यक्रम को विश्वविद्यालय में लागू करने का प्रयत्न भी किया था।

कार्य की व्यस्तता व अत्याधिक श्रम के कारण दि॰ ३१ मार्च १९२९ को कृष्णाजी का आकस्मिक स्वर्गवास हुआ। सन् २०१९ ई॰ को कृष्णाजी के १५०वीं जयन्ती के अवसर पर ‘वैदिक शिल्प प्रतिष्ठान’ ने ‘अभिनव स्मृतिकार शिल्पकलानिधी श्री. कृष्णाजी विनायक वझे गौरव ग्रंथ, भाग-१ (व्यक्तित्व आणि कर्तृत्व)’ नामक गौरव ग्रन्थ का प्रकाशन किया है।

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